अनूपगढ़ में पराली जलाने पर लगा फुलस्टॉप, पराली अब समस्या नहीं, आय का जरिया, किसानों ने कमाया ₹1 लाख तक का अतिरिक्त मुनाफा

अनूपगढ़ में पराली जलाने पर लगा फुलस्टॉप,  पराली अब समस्या नहीं, आय का जरिया, किसानों ने कमाया ₹1 लाख तक का अतिरिक्त मुनाफा

अनूपगढ़ के किसानों ने एक अभूतपूर्व बदलाव लाकर देश को नई राह दिखाई है. इन किसानों ने पराली जलाना पूरी तरह बंद कर दिया है और इसे आय के एक बड़े स्रोत में बदल दिया है. पराली की ‘समस्या’ को ‘समाधान’ में बदलने का यह मॉडल प्रदूषण पर लगाम लगाने के साथ ही किसानों की आय में ₹1 लाख तक की बढ़ोतरी कर रहा है और स्थानीय मजदूरों को बड़े पैमाने पर रोजगार दे रहा है

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अनूपगढ़ क्षेत्र, खासकर 28 ए और आसपास के गांवों के किसान अब पराली को जलाकर नष्ट नहीं करते. इसके बजाय, वे नई तकनीक का उपयोग कर पराली को काटकर उसकी गांठें (Bales) बना रहे हैं और उसे सीधे फैक्ट्रियों को बेच रहे हैं. किसान बताते हैं कि बेची गई इस पराली का उपयोग फैक्ट्रियों में इन्थेन ऑयल और बायो गैस बनाने के लिए किया जा रहा है, जिससे यह बेकार वस्तु अब एक मूल्यवान संसाधन बन गई है

किसान स्वर्ण सिंह ने बताया कि पराली को काटने और गांठें बनाने का काम तीन चरणों में होता है, जिसके लिए तीन महंगी मशीनों का उपयोग किया जाता है. पहली मशीन पराली को काटती है. दूसरी मशीन कटी हुई पराली को खेत में इकट्ठा करती है. तीसरी मशीन उसकी मजबूत गांठें बनाती है. गांठें बनने के बाद मजदूरों की मदद से ट्रैक्टर और ट्रक में लोड करके उन्हें छत्तरगढ़ स्थित फैक्ट्री तक पहुंचाया जाता है. इस पूरे काम में 50 से 60 मजदूरों की आवश्यकता होती है, जिससे स्थानीय लोगों को बड़ा रोजगार मिल रहा है

उन्होंने बताया कि पराली काटने और गांठें बनाने वाली तीनों मशीनों की कुल कीमत करीब ₹19 लाख है. राजस्थान सरकार इन मशीनों पर सब्सिडी नहीं दे रही है. अगर सरकार पंजाब की तरह यहां भी सब्सिडी देना शुरू कर दे, तो अनूपगढ़ ही नहीं, पूरे राजस्थान के किसान इस तकनीक को अपनाएंगे और प्रदूषण की समस्या पूरी तरह खत्म हो जाएगी. उन्होंने धान की सरकारी खरीद शुरू करने की भी मांग की, जिससे किसानों को और राहत मिल सके

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