मुंबई। महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम देखने को मिल रहा है। शिवसेना संस्थापक बालासाहेब ठाकरे द्वारा स्थापित पार्टी के भीतर एक बार फिर टूट की चर्चाओं ने सियासी हलचल बढ़ा दी है। खबरें हैं कि शिवसेना (यूबीटी) के छह सांसद एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले शिवसेना गुट में शामिल हो सकते हैं। यदि ऐसा होता है तो यह उद्धव ठाकरे के लिए बड़ा राजनीतिक झटका माना जाएगा।
सूत्रों के अनुसार, संभावित दलबदल को लेकर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को भी पत्र भेजे जाने की चर्चा है। इस बीच उद्धव ठाकरे ने नई दिल्ली में पार्टी के संसदीय दल की बैठक बुलाई, लेकिन कथित तौर पर बागी माने जा रहे सांसद उसमें शामिल नहीं हुए। इससे पार्टी के भीतर असंतोष और टूट की अटकलों को और बल मिला है।
“जो जाना चाहते हैं, चले जाएं” – उद्धव ठाकरे
सांसदों के शिंदे गुट में जाने की अटकलों के बीच उद्धव ठाकरे ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि उनकी पार्टी अकेले चुनाव लड़ने के लिए तैयार है और जो नेता पार्टी छोड़ना चाहते हैं, वे छोड़ सकते हैं। उनके इस बयान को संभावित दलबदल के प्रति स्पष्ट संदेश माना जा रहा है।
महाराष्ट्र में चर्चा का विषय बना ‘ऑपरेशन टाइगर’
पिछले कुछ दिनों से राज्य की राजनीति में ‘ऑपरेशन टाइगर’ की चर्चा जोरों पर है। माना जा रहा है कि यह अभियान शिवसेना यूबीटी के सांसदों और नेताओं को शिंदे गुट में शामिल कराने की रणनीति का हिस्सा है। पार्टी के वरिष्ठ नेता संजय राउत, अरविंद सावंत और अनिल देसाई दिल्ली में डेरा डाले हुए हैं और संभावित दलबदल को रोकने के लिए कानूनी विकल्पों पर विचार कर रहे हैं।
बताया जा रहा है कि संजय राउत और अनिल देसाई ने संवैधानिक और संसदीय विशेषज्ञों से सलाह-मशविरा भी किया है, ताकि यदि सांसद पार्टी छोड़ते हैं तो कानूनी स्तर पर क्या कदम उठाए जा सकते हैं, इसकी तैयारी की जा सके।
विशेषज्ञों ने जताई चिंता
शिवसेना के इतिहासकार और लेखक प्रकाश अकोलकर का मानना है कि यह केवल राजनीतिक नहीं बल्कि संसाधनों और प्रभाव का भी संघर्ष है। उन्होंने कहा कि मौजूदा दौर में क्षेत्रीय दलों के लिए बड़े राजनीतिक दलों का मुकाबला करना चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है।
वहीं पार्टी कार्यकर्ताओं का एक वर्ग मानता है कि उद्धव ठाकरे को इस संकट का डटकर सामना करना चाहिए और पार्टी को पुनर्गठित कर कार्यकर्ताओं के बीच नई ऊर्जा पैदा करनी चाहिए।
आगे और बढ़ सकती है मुश्किल
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि सांसदों के बाद विधायकों में भी टूट होती है तो शिवसेना यूबीटी के सामने अस्तित्व का बड़ा संकट खड़ा हो सकता है। पार्टी पहले ही चुनाव चिन्ह और संगठनात्मक नियंत्रण खो चुकी है। ऐसे में आने वाले दिनों में महाराष्ट्र की राजनीति में होने वाले घटनाक्रम पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।
फिलहाल, शिवसेना यूबीटी के लिए यह सबसे बड़ी राजनीतिक परीक्षा मानी जा रही है, जबकि शिंदे गुट अपनी ताकत बढ़ाने की दिशा में लगातार सक्रिय दिखाई दे रहा है।



