21 सितंबर को निकायों में अध्यक्ष, सभापति और मेयर के चुनाव से साफ हुई शहरों की नई सियासी तस्वीर
जयपुर। राजस्थान के नगरीय निकाय चुनाव के बाद सोमवार, 21 सितंबर 2026 को शहरों की सरकार के मुखिया चुनने की प्रक्रिया ने प्रदेश की सियासत को नया मोड़ दे दिया। नगर निगमों में मेयर, नगर परिषदों में सभापति और नगर पालिकाओं में अध्यक्ष पद के लिए हुए चुनाव में कई जगह सीधे मुकाबले हुए, तो कई निकायों में निर्दलीय पार्षद निर्णायक भूमिका में नजर आए।
राज्य में कुल 305 नगर निकाय हैं। इनमें से 32 निकायों में अध्यक्ष/सभापति/मेयर का चुनाव पहले ही निर्विरोध हो चुका था। सोमवार को 273 निकायों में चुनाव हुआ। वहीं जयपुर, जोधपुर और कोटा नगर निगम तथा सुकेत नगर पालिका के कुछ वार्डों में पुनर्मतदान के कारण संबंधित पदों के चुनाव 25 सितंबर को होंगे।
पांच बड़े नगर निगमों में भाजपा का दबदबा
सोमवार को जिन पांच नगर निगमों में मेयर का चुनाव हुआ, उनमें अजमेर, पाली, उदयपुर और अलवर में भाजपा के उम्मीदवार विजयी रहे, जबकि बीकानेर में कांग्रेस ने मेयर पद हासिल किया। भरतपुर और भीलवाड़ा में भाजपा के मेयर पहले ही निर्विरोध चुने जा चुके थे।
पाली में नमिता बुबकिया बनीं मेयर
पाली नगर निगम का चुनाव सबसे ज्यादा चर्चा में रहा। यहां भाजपा की नमिता बुबकिया मेयर निर्वाचित हुईं। उपलब्ध परिणाम के अनुसार भाजपा को 33 वोट, कांग्रेस को 3 वोट और अन्य को 29 वोट मिले। यानी पार्षदों के मूल दलगत गणित से अलग जाकर मेयर चुनाव में वोटिंग का समीकरण बदला।
अजमेर में बड़ा उलटफेर
अजमेर में कांग्रेस के पास 37 पार्षद थे, जबकि भाजपा के पास 32। इसके बावजूद भाजपा की अनामिका शर्मा मेयर निर्वाचित हुईं। उन्हें 43 वोट, जबकि कांग्रेस प्रत्याशी को 37 वोट मिले। यहां निर्दलीय पार्षदों की भूमिका निर्णायक रही।

उदयपुर में भाजपा की जीत
उदयपुर नगर निगम में भाजपा के पारस सिंघवी मेयर निर्वाचित हुए। रिपोर्ट के अनुसार भाजपा को 55 और कांग्रेस को 25 वोट मिले। चार निर्दलीय पार्षदों में दो ने भाजपा और दो ने कांग्रेस का समर्थन किया।
अलवर में भी भाजपा
अलवर नगर निगम में भाजपा की सुमन लता अग्रवाल मेयर निर्वाचित हुईं। वहीं बीकानेर में कांग्रेस के अनिल कल्ला ने मेयर पद हासिल कर भाजपा को झटका दिया।
32 निकायों में निर्विरोध चुनाव
अध्यक्ष/सभापति/मेयर चुनाव की प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही प्रदेश के 32 निकायों में निर्विरोध निर्वाचन हो चुका था। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार इनमें 28 पद भाजपा, 2 कांग्रेस और 2 भाजपा समर्थित निर्दलीयों के खाते में गए थे।
इसके बाद 21 सितंबर के चुनावों में भी अलग-अलग जिलों से भाजपा, कांग्रेस और अन्य दलों के उम्मीदवारों की जीत सामने आई।
निर्दलीयों ने फिर बदला चुनावी गणित
इस पूरे निकाय चुनाव की सबसे अहम तस्वीर निर्दलीय पार्षदों की भूमिका रही। कई निकायों में भाजपा या कांग्रेस को अपने दम पर बहुमत नहीं मिला और अध्यक्ष या मेयर चुनाव में निर्दलीय पार्षदों के वोट निर्णायक बन गए।
अजमेर इसका बड़ा उदाहरण रहा, जहां कांग्रेस के पास अधिक पार्षद होने के बावजूद मेयर पद भाजपा के खाते में गया। पाली में भी मेयर चुनाव का परिणाम पार्षदों के चुनावी गणित से अलग रहा।
वार्ड चुनाव में कांग्रेस और भाजपा के बीच कड़ा मुकाबला
14 सितंबर को घोषित वार्ड परिणामों में भाजपा और कांग्रेस दोनों ने बड़ी संख्या में सीटें जीतीं और निर्दलीयों ने भी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराई। उपलब्ध संकलित आंकड़ों के अनुसार भाजपा और कांग्रेस के बीच वार्ड स्तर पर अंतर बहुत बड़ा नहीं रहा, जबकि हजारों निर्दलीय पार्षदों की जीत ने कई निकायों में बोर्ड गठन और अध्यक्ष चुनाव को दिलचस्प बना दिया।
यही वजह रही कि पार्षदों के चुनाव के बाद भी कई शहरों में असली मुकाबला मेयर/सभापति/अध्यक्ष की कुर्सी के लिए बचा रहा।
अभी पूरी तस्वीर बाकी
21 सितंबर के चुनावों के बाद राजस्थान के अधिकांश निकायों में शहर की नई सरकार का चेहरा सामने आ गया है, लेकिन तस्वीर अभी पूरी तरह अंतिम नहीं हुई है। जयपुर, जोधपुर और कोटा नगर निगम तथा सुकेत नगर पालिका में कुछ वार्डों के पुनर्मतदान के कारण अध्यक्ष/मेयर पद का चुनाव 25 सितंबर को होना है।
इसलिए प्रदेश में भाजपा, कांग्रेस, निर्दलीय और अन्य दलों के अंतिम कुल अध्यक्ष/सभापति/मेयर पदों की संख्या 25 सितंबर की प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही पूरी तरह तय मानी जाएगी।
सुमेरपुर पर भी नजर
पाली जिले की राजनीति में सुमेरपुर का परिणाम भी खास रहा है। 35 वार्ड वाली सुमेरपुर नगर पालिका में भाजपा ने 19 पार्षद, कांग्रेस ने 9 और निर्दलीयों ने 7 सीटें जीती थीं। ऐसे में भाजपा के पास बहुमत का आंकड़ा पार था और अध्यक्ष चुनाव में बोर्ड गठन का रास्ता स्पष्ट था।
राजस्थान के निकाय चुनाव ने एक बात साफ कर दी है—पार्षदों के चुनाव के बाद भी अध्यक्ष की कुर्सी तक पहुंचने का गणित अलग हो सकता है। कई जगह दलगत संख्या से ज्यादा महत्वपूर्ण निर्दलीय पार्षदों का रुख रहा और इसी ने कई निकायों में अंतिम तस्वीर बदल दी।





