नई दिल्ली। NEET-UG 2026 पेपर लीक विवाद ने देश की परीक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब शिक्षा मंत्रालय की उच्चस्तरीय विशेषज्ञ समिति ने वर्ष 2024 में ही पेपर लीक रोकने का विस्तृत ब्लूप्रिंट तैयार कर सरकार को सौंप दिया था, तो उसे समय पर पूरी तरह लागू क्यों नहीं किया गया?
बताया जा रहा है कि 3 मई 2026 को आयोजित NEET-UG परीक्षा में शामिल लाखों छात्रों के बीच परीक्षा से पहले एक कथित “गेस पेपर” सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, जिसके कई प्रश्न वास्तविक प्रश्नपत्र से मेल खाने का दावा किया गया। विवाद बढ़ने के बाद परीक्षा रद्द की गई और 21 जून 2026 को दोबारा परीक्षा आयोजित करनी पड़ी।
2024 में बनी थी हाई लेवल कमेटी
NEET-2024 विवाद के बाद शिक्षा मंत्रालय ने 22 जून 2024 को पूर्व ISRO प्रमुख डॉ. के. राधाकृष्णन की अध्यक्षता में सात सदस्यीय उच्चस्तरीय समिति गठित की थी। समिति ने कई बैठकों के बाद अक्टूबर 2024 में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी, जिसमें परीक्षा प्रणाली को सुरक्षित बनाने के लिए 101 सिफारिशें दी गई थीं।
समिति ने स्पष्ट रूप से कहा था कि प्रश्नपत्र छपाई से लेकर परीक्षा केंद्र तक पहुंचने की प्रक्रिया सबसे कमजोर कड़ी है और यहीं से पेपर लीक की आशंका सबसे अधिक रहती है।
क्या था सबसे बड़ा समाधान?
समिति ने “कंप्यूटर असिस्टेड सिक्योर पेपर बेस्ड टेस्टिंग” मॉडल अपनाने की सिफारिश की थी।
इस मॉडल के तहत प्रश्नपत्र पहले से छापकर देशभर में भेजने के बजाय एन्क्रिप्टेड रूप में सीधे परीक्षा केंद्र के सुरक्षित सर्वर तक भेजे जाते और परीक्षा शुरू होने से ठीक पहले उसी केंद्र पर प्रिंट किए जाते। समिति का मानना था कि इससे प्रिंटिंग, स्टोरेज और ट्रांसपोर्ट के दौरान पेपर लीक की संभावना काफी कम हो सकती है।
समिति ने इस व्यवस्था को पहले पायलट प्रोजेक्ट के रूप में लागू करने की भी सलाह दी थी।
समिति की प्रमुख सिफारिशें
रिपोर्ट में कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए गए थे, जिनमें शामिल हैं—
- प्रश्नपत्र का एन्क्रिप्टेड डिजिटल ट्रांसफर।
- प्रिंटिंग प्रेस में कड़ी निगरानी और मोबाइल पर प्रतिबंध।
- प्रश्नपत्र की पूरी ट्रैकिंग व्यवस्था।
- प्रत्येक जिले में डीएम और एसपी की निगरानी समिति।
- परीक्षा केंद्रों का कंप्यूटर आधारित चयन।
- छात्रों को यथासंभव अपने जिले में परीक्षा केंद्र।
- बड़े स्तर की परीक्षाएं कई चरणों में कराने पर विचार।
- एक से अधिक प्रश्नपत्र सेट तैयार करना।
- परीक्षा संचालन का कार्य एक ही एजेंसी पर निर्भर न रखना।
- सुधारों की निगरानी के लिए नियमित समीक्षा प्रणाली।
सरकार का पक्ष
सरकार का कहना है कि समिति की कई सिफारिशों पर अमल किया जा चुका है तथा कुछ पर कार्य जारी है। जिला स्तरीय समन्वय समितियों और उच्चस्तरीय निगरानी तंत्र का गठन भी किया गया।
हालांकि, आलोचकों का कहना है कि समिति की सबसे महत्वपूर्ण सिफारिश मानी जाने वाली कंप्यूटर असिस्टेड सिक्योर पेपर बेस्ड टेस्टिंग प्रणाली अब तक पूरी तरह लागू नहीं हो सकी।
जांच में क्या सामने आया?
जांच एजेंसियों के अनुसार पेपर लीक की जांच में कई राज्यों तक फैले नेटवर्क की भूमिका की जांच की गई। इस मामले की जांच राजस्थान पुलिस की एसओजी से शुरू होकर बाद में केंद्रीय एजेंसियों तक पहुंची।
सबसे बड़ा सवाल अभी भी बरकरार
पूरा विवाद अब केवल पेपर लीक तक सीमित नहीं है। मुख्य प्रश्न यह है कि यदि सुरक्षा सुधारों का विस्तृत रोडमैप पहले से मौजूद था, तो उन्हें समय पर लागू क्यों नहीं किया गया?
फिलहाल इस मामले में जांच जारी है और परीक्षा प्रणाली को अधिक सुरक्षित बनाने को लेकर बहस तेज हो गई है। करोड़ों छात्र और अभिभावक अब ऐसी व्यवस्था की उम्मीद कर रहे हैं, जिसमें प्रतियोगी परीक्षाओं की निष्पक्षता और विश्वसनीयता पूरी तरह सुनिश्चित हो सके।

