15 पार्षदों से शुरू हुआ सफर 35 सदस्यीय बोर्ड तक पहुंचा, 1986 में भाजपा-कांग्रेस 9-9 पर अटकी तो एक वोट ने भाजपा के पक्ष में बदल दिया था पूरा समीकरण
सुमेरपुर। सुमेरपुर नगर पालिका का इतिहास करीब 51 साल पुराना है। इस सफर में नगर पालिका ने बिना चुनाव अध्यक्ष बनने से लेकर अविश्वास प्रस्ताव, लंबे प्रशासनिक दौर, बराबर संख्या वाले बोर्ड और क्रॉस वोटिंग से सत्ता का समीकरण बदलने तक कई राजनीतिक उतार-चढ़ाव देखे हैं। अब 2026 के निकाय चुनाव के बाद सुमेरपुर नगर पालिका अपने इतिहास के एक और महत्वपूर्ण पड़ाव पर खड़ी है।
1 अप्रैल 1975 को ग्राम पंचायत से बनी थी नगर पालिका
सुमेरपुर में नगर पालिका व्यवस्था की शुरुआत 1 अप्रैल 1975 को हुई थी। इससे पहले यहां ग्राम पंचायत का शासन था। उस समय ग्राम पंचायत के सरपंच सुखराज जैन थे। नगर पालिका बनने के साथ ही सुखराज जैन को नगर पालिका के पहले अध्यक्ष की जिम्मेदारी मिल गई। खास बात यह थी कि उस समय अध्यक्ष पद के लिए कोई प्रत्यक्ष चुनाव नहीं हुआ था।
हालांकि उनका कार्यकाल ज्यादा लंबा नहीं चला। उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव आया और उन्हें अध्यक्ष पद से हटा दिया गया। इसके बाद राजस्थान सरकार ने चुन्नीलाल परिहार को मनोनीत कर नगर पालिका का अध्यक्ष बनाया।
1977 से करीब नौ साल तक रहा प्रशासक का दौर
चुन्नीलाल परिहार का कार्यकाल 29 जुलाई 1977 तक रहा। इसके बाद नगर पालिका में निर्वाचित बोर्ड के बजाय प्रशासनिक व्यवस्था लागू रही।
30 जुलाई 1977 से 29 जुलाई 1986 तक करीब नौ वर्ष नगर पालिका की कमान उपखंड अधिकारी प्रशासन के हाथों में रही। इसके बाद भी सुमेरपुर को लंबे समय तक निर्वाचित अध्यक्ष नहीं मिला। 28 जुलाई 1989 से 29 नवंबर 1994 तक करीब पांच वर्ष तक बाली के उपखंड अधिकारी ने प्रशासक के रूप में नगर पालिका का संचालन किया।
1986 में पहली बार हुआ चुनाव, भाजपा-कांग्रेस आईं 9-9 पर
सुमेरपुर नगर पालिका के राजनीतिक इतिहास में 1986 का चुनाव बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। जुलाई 1986 में पहली बार नगर पालिका के चुनाव हुए। उस समय बोर्ड में कुल 18 पार्षद थे।
चुनाव परिणाम सामने आया तो भाजपा और कांग्रेस दोनों के खाते में 9-9 पार्षद आए। यानी किसी भी दल के पास स्पष्ट बहुमत नहीं था। इसके बाद अध्यक्ष पद का चुनाव हुआ और यहीं से सुमेरपुर की राजनीति में एक ऐसी घटना हुई जिसे आज भी याद किया जाता है।
एक पार्षद की क्रॉस वोटिंग ने पूरा समीकरण बदल दिया।
एक वोट के अंतर से भाजपा के पक्ष में बोर्ड बन गया और 30 जुलाई 1986 को मीठालाल बोहरा सुमेरपुर नगर पालिका के पहले निर्वाचित अध्यक्ष बने।
बराबर संख्या के कारण बोर्ड में प्रस्ताव पारित करवाना आसान नहीं था। उस समय अध्यक्ष को बराबरी की स्थिति में निर्णायक अतिरिक्त वोट देने का अधिकार भी था, जिससे महत्वपूर्ण प्रस्तावों में अध्यक्ष की भूमिका काफी अहम हो जाती थी। मीठालाल बोहरा करीब तीन वर्ष तक अध्यक्ष रहे और उनका कार्यकाल 27 जुलाई 1989 तक चला।
15 पार्षदों से 35 सदस्यीय बोर्ड तक पहुंचा सुमेरपुर
समय के साथ सुमेरपुर नगर पालिका का विस्तार होता गया और पार्षदों की संख्या भी बढ़ती गई।
1975 — 15 पार्षद के आसपास
1986 — 18 पार्षद
1999 — 20 पार्षद
2009 — 25 पार्षद
2019 — 35 पार्षद
इस तरह 1975 में सीमित संख्या वाले बोर्ड से शुरू हुई नगर पालिका की राजनीतिक यात्रा आज 35 सदस्यीय बोर्ड तक पहुंच चुकी है।
नगर पालिका की आय और व्यवस्था भी बदली
शुरुआती दौर में नगर पालिका की आय के प्रमुख साधनों में चुंगी, हाउस टैक्स और तामीर स्वीकृतियां शामिल थीं। शहर के अलग-अलग हिस्सों में चुंगी नाके भी संचालित होते थे।
समय के साथ व्यवस्था बदलती गई। चुंगी और हाउस टैक्स जैसी व्यवस्थाएं समाप्त हुईं और वर्तमान में नगर पालिका की आय में भूखंडों की नीलामी, भूमि रूपांतरण, निर्माण स्वीकृतियां तथा सरकार से मिलने वाले अनुदान और बजट की महत्वपूर्ण भूमिका है।
अब सुमेरपुर को मिलेगा 18वां पालिकाध्यक्ष
सुमेरपुर नगर पालिका के गठन से अब तक 17 पालिकाध्यक्ष रह चुके हैं। 2026 के चुनाव के बाद अब नगर पालिका को अपना 18वां पालिकाध्यक्ष मिलने जा रहा है। इस बार सुमेरपुर का अध्यक्ष पद जनरल ओपन है। इसका अर्थ है कि किसी विशेष आरक्षित वर्ग तक पद सीमित नहीं है और पात्र निर्वाचित पार्षद अध्यक्ष पद की दौड़ में शामिल हो सकता है। अध्यक्ष पद का चुनाव 21 सितंबर 2026 को प्रस्तावित बताया गया है।
2026 में फिर 35 सदस्यीय बोर्ड, लेकिन इस बार गणित अलग
2026 के निकाय चुनाव में सुमेरपुर के सभी 35 वार्डों के परिणाम सामने आ चुके हैं।
चुनाव के बाद पार्टीवार तस्वीर इस प्रकार है—
भाजपा — 19
कांग्रेस — 9
निर्दलीय — 7
35 सदस्यीय बोर्ड में बहुमत के लिए 18 पार्षदों की जरूरत होती है। भाजपा ने 19 सीटें जीतकर बहुमत का आंकड़ा पार कर लिया है। यानी 1986 की तरह इस बार भाजपा और कांग्रेस के बीच 9-9 की बराबरी नहीं है। इस बार भाजपा के पास स्पष्ट बहुमत है।
लेकिन सुमेरपुर का इतिहास यह भी बताता है कि अध्यक्ष की कुर्सी की राजनीति सिर्फ आंकड़ों से नहीं, बल्कि आखिरी समय के राजनीतिक समीकरणों से भी प्रभावित हो सकती है।
अब शहर की नजर चेयरमैन की कुर्सी पर
2026 के परिणाम के बाद सुमेरपुर में सबसे बड़ा सवाल यही है कि भाजपा के 19 पार्षदों में से नगर पालिका की कमान किसके हाथ जाएगी? अध्यक्ष पद सामान्य/जनरल ओपन होने के कारण किसी एक जाति या वर्ग तक दावेदारी सीमित नहीं है। ऐसे में भाजपा के निर्वाचित पार्षदों में कई नामों को लेकर राजनीतिक चर्चाएं शुरू हो गई हैं।
सुमेरपुर की राजनीति में अब सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की है कि पार्टी किस चेहरे पर भरोसा जताती है और किस नाम पर 19 पार्षदों के बीच सहमति बनती है।
1986 का इतिहास 2026 में फिर क्यों याद आ रहा है?
1986 में भाजपा और कांग्रेस के पास 9-9 पार्षद थे। एक क्रॉस वोटिंग ने पूरा राजनीतिक समीकरण बदल दिया और भाजपा के मीठालाल बोहरा अध्यक्ष बने। 2026 में स्थिति पूरी तरह अलग है। भाजपा के पास 19 पार्षद हैं और बहुमत के लिए जरूरी संख्या 18 है। फिर भी 1986 की घटना इसलिए चर्चा में है क्योंकि वह सुमेरपुर के राजनीतिक इतिहास का ऐसा उदाहरण है, जिसने यह साबित किया था कि नगर पालिका की अध्यक्ष की कुर्सी के लिए पार्षदों की भूमिका कितनी निर्णायक हो सकती है।
51 साल की यात्रा में कई ऐतिहासिक पड़ाव
सुमेरपुर नगर पालिका की कहानी को देखें तो इसमें कई महत्वपूर्ण अध्याय रहे हैं।
1975 में ग्राम पंचायत से नगर पालिका बनी।
सुखराज जैन पहले अध्यक्ष बने।
अविश्वास प्रस्ताव के बाद चुन्नीलाल परिहार मनोनीत अध्यक्ष बने।
1977 से लंबे समय तक प्रशासक व्यवस्था रही।
1986 में पहली बार चुनाव हुआ।
भाजपा और कांग्रेस 9-9 पर आईं।
क्रॉस वोटिंग से भाजपा के मीठालाल बोहरा पहले निर्वाचित अध्यक्ष बने।
15 पार्षदों से शुरू हुआ सफर 35 सदस्यीय बोर्ड तक पहुंचा।
और अब 2026 में 18वें पालिकाध्यक्ष का इंतजार है।
अब इतिहास का अगला अध्याय कौन लिखेगा?
सुमेरपुर की नगर पालिका ने 51 वर्षों में राजनीति के कई रंग देखे हैं। 1975 में बिना चुनाव बने पहले अध्यक्ष से लेकर 1986 की क्रॉस वोटिंग और फिर 35 सदस्यीय बोर्ड तक का सफर अपने आप में काफी दिलचस्प रहा है।
2026 में भाजपा ने 19 सीटों के साथ बहुमत हासिल कर लिया है। अब शहर की निगाहें 21 सितंबर को होने वाले अध्यक्ष पद के चुनाव पर हैं। सवाल सिर्फ यह नहीं है कि बोर्ड किसका बनेगा, बल्कि अब असली सवाल यह है—
सुमेरपुर नगर पालिका के इतिहास का 18वां पालिकाध्यक्ष कौन बनेगा?
क्योंकि सुमेरपुर का इतिहास एक बात पहले ही साबित कर चुका है— नगर पालिका की राजनीति में आंकड़े महत्वपूर्ण जरूर हैं, लेकिन अध्यक्ष की कुर्सी तक पहुंचने के लिए राजनीतिक समीकरण भी उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं।




