संयुक्त किसान मोर्चा राष्ट्रपति को पत्र लिखकर भारत-अमेरिका के बीच हुई ट्रेड डील को रद्द करने की मांग करेगा। इसके अंतर्गत संसद सत्र के दूसरे चरण के पहले दिन यानी नौ मार्च को पूरे देश के किसानों से राष्ट्रपति के नाम पत्र लिखवाया जाएगा और राज्यपालों या जिलाधिकारियों को सौंपा जाएगा।
किसानों का आरोप है कि केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल द्वारा की गई घोषणाएं इस आशंका को पुष्ट करती हैं कि सरकार अमेरिकी दबावों का सामना करने में असमर्थ है। संयुक्त किसान मोर्चा के अनुसार, अमेरिकी कृषि सचिव ब्रुक रोलिन्स ने कहा है कि यह समझौता अमेरिका को भारत के विशाल बाजार में अधिक कृषि उत्पाद निर्यात करने की अनुमति देगा, जिससे ग्रामीण अमेरिका में कीमतें बढ़ेंगी और नकदी प्रवाह होगा। किसानों के अनुसार, यह कथन बताने के लिए पर्याप्त है कि डील में भारतीय किसानों के हितों से समझौता किया गया है।
क्या ये प्रतिबंध हटेंगे…?
किसानों का कहना है कि जब अभी डील फाइनल नहीं हुई है तो अमेरिकी मंत्री-अधिकारी इस तरह के दावे कैसे कर रहे हैं। उनके अनुसार, इसका सीधा सा आशय है कि सरकार ने समझौते पर मौखिक स्वीकृति दे दी है। किसान नेताओं का आरोप है कि केंद्र सरकार ने अमेरिका से सभी ‘गैर शुल्क बाधाओं’ को समाप्त करने पर सहमति जताई है।
गैर शुल्क का आशय है कि इसमें ‘पैसे की लेनदेन के अलावा’ अमेरिकी उत्पादों से ‘अन्य सभी प्रतिबंध’ हटा लिए जाएंगे। किसानों का कहना है कि अब तक अमेरिकी गायों को मांस खिलाने के कारण उनका भारतीय बाजार में प्रवेश बंद था, लेकिन गैर शुल्क प्रावधान हटाने पर सहमत होने के कारण यह प्रतिबंध हटाया जा सकता है।
किसानों का आरोप है कि इस डील के बाद भारतीय बाजार में कपास कीमतों में भारी गिरावट हुई है। भारत कपास उत्पादन में पहले नंबर पर है, लेकिन किसानों के अनुसार, केंद्र ने कपास आयात पर टैक्स घटा दिये जिसके कारण कपास की कीमतों में गिरावट आ गई और किसानों को इसका नुकसान उठाना पड़ रहा है।
संयुक्त किसान मोर्चा के अनुसार, अमेरिका में 18.65 लाख किसान हैं, जबकि भारत में 11.10 करोड़ किसान परिवार अपनी आजीविका के लिए कृषि पर निर्भर हैं। अमेरिका में औसत खेत का आकार 469 एकड़ है। इसकी तुलना में भारत में औसत खेत का आकार लगभग 2.67 एकड़ है और 86 प्रतिशत किसानों के पास 5 एकड़ से कम जमीन है। अमेरिका में प्रति किसान औसत सब्सिडी लगभग 23,735 डॉलर है, जो भारतीय मुद्रा में लगभग 21,56,000 रुपये के बराबर है। जबकि भारत अपने किसानों को नाम मात्र की सब्सिडी देता है। ऐसे में दोनों देशों के किसानों में कोई तुलना सही नहीं होगी।
किसान मोर्चा के अनुसार, भारतीय-अमेरिकी किसानों में अंतर केवल कृषि योग्य भूमि और सब्सिडी का ही नहीं है। प्रति एकड़ उत्पादन के मामले में भी भारतीय किसान अमेरिकी किसानों के सामने कहीं नहीं ठहरते। अमेरिका में प्रति हेक्टेयर मक्का की उत्पादकता 11 टन है, जबकि भारत में यह मात्र 3.5 टन है। अमेरिका में प्रति एकड़ सोयाबीन की उत्पादकता 3.4 टन है, भारत में यह मात्र 0.9 टन है। इसी तरह अमेरिका में प्रति हेक्टेयर सेब की उत्पादकता 60 टन है, भारत में यह 10 टन से भी कम है। ऐसे में भारत के किसान अमेरिकी किसानों से प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकते हैं और सरकार को अपने किसानों को बचाने के लिए संरक्षणवादी नीति लागू करनी चाहिए।

मक्का किसानों को नुकसान की आशंका
किसानों का आरोप है कि भारत-अमेरिकी डील पर रोक न लगी तो इससे किसानों को भारी नुकसान हो सकता है। संयुक्त किसान मोर्चा के अनुसार, इस समय भारत 5 लाख टन तक मक्के के आयात पर 15% और इससे अधिक आयात पर 50% शुल्क लगाता है। आरोप है कि नए समझौते में इसे शून्य किया जा सकता है।
अमेरिका प्रतिवर्ष लगभग 377 मिलियन टन मक्का उत्पादन करता है, जिसमें से लगभग 94% जीएम (अनुवांशिक रूप से संशोधित) मक्का होता है, जो निर्यात के लिए विशाल मात्रा उपलब्ध कराता है। जबकि भारत लगभग 43 मिलियन टन मक्का पैदा करा है। अमेरिकी आयात से घरेलू बाजार में कीमत गिरेगी और देश के 120 लाख मक्का किसानों को नुकसान होगा।
किसानों का आरोप है कि इसी तरह गन्ना उत्पादकों के साथ-साथ अन्य भारतीय किसानों को अमेरिकी डील से भारी नुकसान होगा, और किसानों के हित में इस डील को रोका जाना चाहिए।












