राजस्थान में कांग्रेस जिलाध्यक्षों के चयन की प्रक्रिया अब निर्णायक दौर में पहुंच गई है. पार्टी आलाकमान के निर्देश पर प्रदेश के 50 जिलों में चल रही रायशुमारी का काम लगभग पूरा हो चुका है कांग्रेस आलाकमान ने इस बार साफ निर्देश दिए हैं कि जिलाध्यक्षों की नियुक्ति में किसी सांसद, विधायक या कद्दावर नेता की सिफारिश नहीं मानी जाएगी. इस आदेश के बाद प्रदेश के कई नेताओं की चिंता बढ़ गई है, क्योंकि अब तक जिला स्तर पर नियुक्तियों में राजनीतिक सिफारिशें और जातीय समीकरण बड़ी भूमिका निभाते रहे हैं. कई विधायक, पूर्व मंत्री और पूर्व प्रत्याशी खुद भी जिलाध्यक्ष बनने की दौड़ में हैं

केंद्र को भेजी जाएगी 6 नामों की लिस्ट
केंद्रीय पर्यवेक्षक हर जिले में कम से कम 7 दिन रहकर कार्यकर्ताओं, प्रबुद्धजनों और स्थानीय नागरिकों से संवाद कर रहे हैं. इस प्रक्रिया के बाद पर्यवेक्षक 6 नामों की अनुशंसा करते हुए अपनी रिपोर्ट केन्द्रीय नेतृत्व को सौंपेंगे, जिसके बाद प्रदेश में जिलाध्यक्षों की औपचारिक घोषणा की जाएगी
AICC का कहना है कि पार्टी को नई ऊर्जा देने की शुरुआत जिलाध्यक्षों से की जा रही है. इसी मकसद से प्रदेश कांग्रेस कमेटी और केंद्रीय पर्यवेक्षक मिलकर इस चयन प्रक्रिया को पारदर्शी और सहभागी बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं
राहुल गांधी के तय किए गए नए फॉर्मूले के तहत इस बार जिलाध्यक्षों को संगठन में अधिक शक्ति दी जाएगी. उन्हें पार्टी की सबसे मजबूत कड़ी के रूप में तैयार किया जाएगा, ताकि उनकी बात सीधे हाईकमान तक पहुंच सके. इतना ही नहीं, भविष्य में लोकसभा और विधानसभा प्रत्याशियों के चयन में भी जिलाध्यक्ष की राय अहम मानी जाएगी. कांग्रेस नेताओं का मानना है कि इसके तहत जिलाध्यक्षों को न केवल पार्टी की रणनीति में केंद्र में रखा जाएगा, बल्कि उन्हें लंबे समय तक संगठन की रीढ़ की तरह तैयार किया जाएगा
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