MP सरकार ने जारी किया स्पष्टीकरण, ‘सोशल मीडिया पर वायरल OBC आरक्षण की बातें भ्रामक’,

MP सरकार ने जारी किया स्पष्टीकरण, ‘सोशल मीडिया पर वायरल OBC आरक्षण की बातें भ्रामक’,

मध्यप्रदेश की मोहन यादव सरकार ने सोशल मीडिया पर वायरल OBC आरक्षण से जुड़े कंटेंट और टिप्पणियों को भ्रामक करार दिया है. सरकार ने साफ तौर से कहा है कि ये पूरी तरह से फर्जी और गलत हैं और इससे संबंधित आरक्षण के हलफनामे के बारे में स्पष्टीकरण जारी किया है. इसमें कहा गया है कि वायरल की जा रही सामग्री का मध्यप्रदेश शासन के हलफनामे में जिक्र नहीं है और न ही राज्य की किसी घोषित नीति अथवा निर्णय का हिस्सा है.

दरअसल, सोशल मीडिया पर ऐसी खबरें वायरल हो रही थी कि ओबीसी आरक्षण मामले में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष मध्यप्रदेश सरकार ने वर्ण व्यवस्था को लेकर टिप्पणी की है. कुछ टिप्पणियां इस तरह वायरल की जा रही थीं, जैसे वो मध्यप्रदेश शासन के हलफनामे का हिस्सा हैं

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OBC आरक्षण को लेकर सरकार का स्पष्टीकरण

  • मध्य प्रदेश शासन के संज्ञान में यह आया है कि कुछ शरारती तत्वों की ओर से सोशल मीडिया पर यह कहते हुए कुछ टिप्पणियां या सामग्री वायरल की जा रही है कि वे टिप्पणियां सुप्रीम कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत मध्यप्रदेश शासन के ओबीसी आरक्षण से संबंधित मामले के हलफनामे का हिस्सा है.
  • शासन की ओर से शरारती सामग्री का गंभीरता से जांच कराया गया है. सुप्रीम कोर्ट के समक्ष पिछड़ा वर्ग आरक्षण के प्रचलित प्रकरण में अभिलेख के प्रारंभिक जांच से यह तथ्य सामने आया है कि उल्लेखित सोशल मीडिया की टिप्पणियां और कथन पूरी तरह से असत्य, मिथ्या एवं भ्रामक हैं. ये दुष्प्रचार की भावना से किए गए हैं.
  • यह स्पष्ट किया जाता है कि वायरल की जा रही सामग्री मध्यप्रदेश शासन के हलफनामे में उल्लेखित नहीं है और न ही राज्य की किसी घोषित या स्वीकृत नीति अथवा निर्णय का हिस्सा है.
  • प्रथम दृष्टया यह ज्ञात हुआ है कि वस्तुतः उल्लेखित सामग्री मध्यप्रदेश राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष श्री रामजी महाजन द्वारा प्रस्तुत अंतिम प्रतिवेदन (भाग-1) का हिस्सा है. उक्त आयोग का गठन दिनांक 17-11-1980 को किया गया था और आयोग द्वारा दिनांक 22-12-1983 को अपना अंतिम प्रतिवेदन तत्कालीन राज्य शासन को प्रेषित किया गया था.
  • राज्य शासन ने सुप्रीम कोर्ट में ओबीसी आरक्षण संबंधित प्रकरण में राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के विभिन्न प्रतिवेदन भी प्रस्तुत किए हैं, जो शासन के अभिलेखों में सुरक्षित हैं. इन प्रतिवेदनों में महाजन आयोग की रिपोर्ट के साथ-साथ 1994 से 2011 तक के वार्षिक प्रतिवेदन और साल 2022 का राज्य पिछड़ा वर्ग कल्याण आयोग का प्रतिवेदन भी सम्मिलित है.
  • महाजन आयोग का उक्त प्रतिवेदन सुप्रीम कोर्ट के समक्ष भी अभिलेख का भाग रहा है. ऐसे में सुप्रीम कोर्ट भी संबंधित प्रतिवेदन स्वतः ही न्यायिक अभिलेख का हिस्सा है.
  • मध्यप्रदेश सरकार ‘सबका साथ, सबका विकास’ एवं सामाजिक सद्भावना के प्रति पूरी तरह से प्रतिबद्ध है. शासन स्पष्ट करता है कि वायरल की जा रही सामग्री शासन के हलफनामे में उल्लेखित नहीं है और न ही राज्य शासन की किसी स्वीकृत या आधिकारिक नीति या निर्णय का हिस्सा है. यह उल्लेखनीय है कि महाजन रिपोर्ट में 35% आरक्षण की अनुशंसा की गई थी, जबकि राज्य शासन ने 27% आरक्षण लागू किया है. इससे यह स्पष्ट होता है कि राज्य शासन का निर्णय महाजन रिपोर्ट पर आधारित नहीं है.
  • भारत वर्ष में आरक्षण को लेकर विभिन्न विशेषज्ञ समितियों के प्रतिवेदन, समय-समय पर गठित आयोगों की रिपोर्टें और वार्षिक प्रतिवेदन तथा अन्य आधिकारिक सामग्री, जो पूर्व से ही शासकीय अभिलेखों का भाग रही हैं और विभिन्न प्रकरणों में भी अभिलेख का हिस्सा रही हैं, माननीय न्यायालय के समक्ष हमेशा प्रस्तुत की जाती रही हैं.
  • ऐसे एकेडमिक विश्लेषण और समय-समय पर गठित विभिन्न विशेषज्ञ समितियों के अत्यंत विस्तृत प्रतिवेदन और रिपोर्ट के किसी एक भाग को, बिना संदर्भ स्पष्ट किए, सोशल मीडिया पर दुष्प्रचार के रूप में प्रस्तुत करना एक निंदनीय प्रयास है. इसके संबंध में राज्य शासन की ओर से गंभीरता से जांच कर जरूरी कार्रवाई की जाएगी

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